तिल कपोल पर अलक छबि, मुसिकनि कही न जात।
जब चितई पिय लाल तन, भये नैंन सहमात॥१३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
मन रूपी राजा, उत्साह रूपी मन्त्री, वक्रगति रूपी रुख (ऊट), वक्षोज रूपी गजराज, नयन रूपो अश्व तथा अङ्कुली रूपी पयादे के योग से श्री लाल ने चक्रव्यूह की रचना करके श्री प्रिया के क्रीड़ा-मोहरे रूपी राजा को मात देने का आह्यान किया ।1१२॥श्री प्रिया ने अपने कपोल स्थित तिल पर लहराती अलक लट-छवि के साथ रस पूर्ण चितवन से श्री लाल की ओर देखा, तो श्री लाल के नेत्र मात खा गये अर्थात् श्री लाल पर श्री प्रिया जू की विजय हो गयी