॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 16.30

हित-शृङ्गार

नवल नवेली उर बनी, मृदुल चमेली-माल।
सारी सौंधे सौं सनी, अँगिया फूल-गुलाल॥३०॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

नित्य नव वधू श्री श्यामा के वक्षस्थल पर सुकोमल मल्ली-माल शोभित है। वे सौरभ सिञ्चित साड़ी एवं मृदुल गुलाल-पुष्प निर्मित कञ्चुकी धारण किये हुए हैं