मैंहँदी-रँग भीने बने, मृदु कर चरन सुरंग।
नख-मनि दुति अति झलमलै, पानिप झलक अनंग॥३२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री प्रिया जी की रूप-रमणीयता कवित्त श्री किशोरी जी के सुकोमल कर एवं चरण मेंहदी के रङ्ग से अनुरञ्जित हैं । उनकी कर-चरण-नख-मणि-द्युति अतिशय प्रकाशमान् एवं मदन-केलि से प्रभवमान् अनुपम लावण्यमयी है