॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 16.32

हित-शृङ्गार

मैंहँदी-रँग भीने बने, मृदु कर चरन सुरंग।
नख-मनि दुति अति झलमलै, पानिप झलक अनंग॥३२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री प्रिया जी की रूप-रमणीयता कवित्त श्री किशोरी जी के सुकोमल कर एवं चरण मेंहदी के रङ्ग से अनुरञ्जित हैं । उनकी कर-चरण-नख-मणि-द्युति अतिशय प्रकाशमान्‌ एवं मदन-केलि से प्रभवमान्‌ अनुपम लावण्यमयी है