कुंज-कुंज अति झलमलैं, बनति न उपमा आन।
सोम-सूर सत जोरियै, होत न तऊ समान॥७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
“श्रृङ्गार सभा मण्डल” की प्रत्येक कुञ्ज अनुपम प्रकाशमयी है । शत-शत-सूर्य-शशि एकत्रित हो कर भी उसकी समता कर सकने में असमर्थ हैं