॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.22

सभा-मण्डल

सुरत-रंग सुख में सरस, दोऊ रस की रासि।
मरम भिदी बतियनिं करैं, मृदु-मृदु ईषद हासि॥२२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

मध्य में भाँति-भाँति की रचनाओं से युक्त चौसठ द्वारों का भव्य भवन है, उस अपार प्रकाशमय धाम की समता कोटि-कोटि सूर्य भी नहीं कर सकते । 1१९॥इस दिव्य धाम के प्रत्येक द्वार पर अनुराग भरी सहचरियाँ सेवा तत्पर रहती हैं जिनका, प्रिया-प्रियतम की सेवा का ही सभामंडल-वर्णन दोहा रसनिधि युगल प्रेम रङ्गरस के रसिक है, वे मन्द मधुर हास-परिहासमयी वार्त्तओं से हृदय को उल्लसित करते रहते हैं