सहज सुभग अद्भुत अयन, सुख वरषत चहुँ कोद।
रँगमगे नवल-किसोर दोउ, तामें करत विनोद॥२५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
सहज शोभामयी अद्भुत कुञ्ज है , जहाँ सुख की अनवरत वृष्टि होती रहती है , वहाँ रस रङ्ग भरे नवल किशोर लाड़िले सतत रङ्ग विनोद करते रहते हैं