॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.25

सभा-मण्डल

सहज सुभग अद्भुत अयन, सुख वरषत चहुँ कोद।
रँगमगे नवल-किसोर दोउ, तामें करत विनोद॥२५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

सहज शोभामयी अद्भुत कुञ्ज है , जहाँ सुख की अनवरत वृष्टि होती रहती है , वहाँ रस रङ्ग भरे नवल किशोर लाड़िले सतत रङ्ग विनोद करते रहते हैं