॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.27

सभा-मण्डल

सुरँग बिछौना मृदुल अति, भाँति-भाँति के आनि।
जो जैसैं जिहिं ठाँ बनैं, सखिनि बिछाये बानि॥२७॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

सभा में युगल-शोभा दोहा सभा-दर्शन दोहा सखियों ने अनेक प्रकार के रकङ्ग-बिरङ्गे कोमल आस्तरण, जहाँ जैसे फबे, ला कर बिछाये हैं