सुरँग बिछौना मृदुल अति, भाँति-भाँति के आनि।
जो जैसैं जिहिं ठाँ बनैं, सखिनि बिछाये बानि॥२७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
सभा में युगल-शोभा दोहा सभा-दर्शन दोहा सखियों ने अनेक प्रकार के रकङ्ग-बिरङ्गे कोमल आस्तरण, जहाँ जैसे फबे, ला कर बिछाये हैं