॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.44

सभा-मण्डल

लक्ष-लक्ष के जूथ तहाँ, अगनित अमित अपार।
रसन कोटि जौ हौंहि तन, कहि न सकति विस्तार॥४४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

लक्ष-लक्ष सखियों के यूथ गणना रहित , असीम एवं अपार हैं । अनन्त जिह्याएँ हों , तो भी कोई इन सखियों के विस्तार का वर्णन नहीं कर सकता