लक्ष-लक्ष के जूथ तहाँ, अगनित अमित अपार।
रसन कोटि जौ हौंहि तन, कहि न सकति विस्तार॥४४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
लक्ष-लक्ष सखियों के यूथ गणना रहित , असीम एवं अपार हैं । अनन्त जिह्याएँ हों , तो भी कोई इन सखियों के विस्तार का वर्णन नहीं कर सकता