कंजमुखी कमलावती, कनकांगी रही सोहि।
केलिकला कृष्णावती, कुमुदा रही छबि जोहि॥६६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
कञ्जमुखी , कमलावती एवं कनकाङ्गी अति शोभामयी हैं । केलिकला , कृष्णावती , कुमुदा ये युगल छबि को निहारा करती हैं