॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.66

सभा-मण्डल

कंजमुखी कमलावती, कनकांगी रही सोहि।
केलिकला कृष्णावती, कुमुदा रही छबि जोहि॥६६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

कञ्जमुखी , कमलावती एवं कनकाङ्गी अति शोभामयी हैं । केलिकला , कृष्णावती , कुमुदा ये युगल छबि को निहारा करती हैं