चंप चमेली केतकी, वासंती रस ऐंन।
बेलि गुलाली सेवती, सेवत हैं दिन-रैंन॥७३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
गुलाली और सेवती लता रूपी सखियाँ युगल की अहर्निश सेवा किया करती हैं