॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.83

सभा-मण्डल

अपनौ अपनौ गुन जितौ, हित के रस सौं सानि।
ते सब आगैं दुहुँनि के, प्रगट करति हैं आनि॥८३॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

ये सब सखियाँ अपने-अपने प्रेमरस-रञ्जित समस्त गुणों को श्री युगल के सम्मुख प्रकट करती रहती हैं