अपनौ अपनौ गुन जितौ, हित के रस सौं सानि।
ते सब आगैं दुहुँनि के, प्रगट करति हैं आनि॥८३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
ये सब सखियाँ अपने-अपने प्रेमरस-रञ्जित समस्त गुणों को श्री युगल के सम्मुख प्रकट करती रहती हैं