॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.135

सभा-मण्डल

कंचन चौकी पर दोऊ, राजत भाँति अनूप।
बसन उतारे सुठि बने, बाढ्यौ सतगुन रूप॥१३५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

अनुपम रूप लावण्यमय युगल हेममयी चौकी पर आकर विराजमान्‌ हुए और सखियों ने स्नान के लिये जब उनको वस्त्रों से विलग किया, तो उनके अङ्गां की शोभा शतगुणमय अधिक हो गर्यी