॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 17.145

सभा-मण्डल

सीसनि सुभग जराव के, झलकत मौरी मौर।
देखि छबीली भाँति दोऊ, छबि भूली तेहि ठौर॥१४५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

युगल के सुभग शिरोभाग पर मणि-जटित मौरी एवं मौर की छबीली छटा का अवलोकन कर के मूर्तिमान्‌ छबि भी अपने आप को भूल गयी