सीसनि सुभग जराव के, झलकत मौरी मौर।
देखि छबीली भाँति दोऊ, छबि भूली तेहि ठौर॥१४५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
युगल के सुभग शिरोभाग पर मणि-जटित मौरी एवं मौर की छबीली छटा का अवलोकन कर के मूर्तिमान् छबि भी अपने आप को भूल गयी