नैननि अंजन दियौ जब, रीझी मुकुर निहारि।
दसन खंडि अति हेत सौं, बीरी दई सुकुँवारि॥१६९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
नवल सखी ने नवल लाड़िली के सुन्दर नेत्रों में अञ्जन-रेख अङ्कित कर जब प्रिया को दर्पण दिखाया, तब वे सखी की प्रीतिमयी सेवा पर मुग्ध हो गर्यी, उस समय सुकुमारी प्रिया ने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक अपनी दशन-खण्डित ताम्बूल-बीटिका सखी को दी