कंज-दलनि पर रुचिर कल, करत्ति निर्त्त सुकुँवारि।
तिहिं छिन जहाँ लगि सहचरी, चकित ह्वै रहीं निहारि॥१८२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
सुकुमारी प्रिया कमल के दलों पर अति सुन्दर नृत्य करने लगीं, उनकी नृत्य की विलक्षण गतियों को देखकर समस्त सखियाँ जकी-थकी सी रह गर्यीं