देखत फिरत निसंक वन, जैसैं मत्त गयंद।
बिनु अकुंस रुचि आपनी, दुरत है मुरत स्वछंद॥१९८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
वे युगल मत्त गजराज की भाँति निःशङ्क भाव से श्रीवन की शोभा का अवलोकन करते हुए विचरण करने लगे, मानो अङ्कशहीन मत्त मतङ्ग स्वच्छन्द भाव से अपनी रुचि के अनुसार इतस्ततः भ्रमण कर रहा हो