छिन-छिन ते सब पियहि सिखावै। तातें अधिक प्रिया मन भावै॥५६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
इन्दुलेखा जी प्रतिक्षण प्रियतम लाल को वशीकरण एवं मोहन यसन्त्रों की शिक्षा देती रहती हैं । इस कारण वे श्री प्रिया को भी अत्यन्त प्रिय लगती हैं