॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 18.56

रस-मुक्तावली

छिन-छिन ते सब पियहि सिखावै। तातें अधिक प्रिया मन भावै॥५६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

इन्दुलेखा जी प्रतिक्षण प्रियतम लाल को वशीकरण एवं मोहन यसन्त्रों की शिक्षा देती रहती हैं । इस कारण वे श्री प्रिया को भी अत्यन्त प्रिय लगती हैं