॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 18.82

रस-मुक्तावली

तेहि सुख-रंग में रैंन बिहानी। रति-बिहार की तृपति न मानी॥८२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

इस अद्भुत सुखरङ्ग को विलसते यद्यपि समस्त रात्रि व्यतीत हो जाती है, तो भी इस रङ्ग-विनोद में उन्हें तृप्ति का अनुभव नहीं होता है