तेहि सुख-रंग में रैंन बिहानी। रति-बिहार की तृपति न मानी॥८२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
इस अद्भुत सुखरङ्ग को विलसते यद्यपि समस्त रात्रि व्यतीत हो जाती है, तो भी इस रङ्ग-विनोद में उन्हें तृप्ति का अनुभव नहीं होता है