एक चरन हित सौं सहरावै। एक बचन-परिहास सुनावै॥८७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
दोहा एक सखी युगल के सुकोमल चरण-तलों को सहलाने लगी और एक मधुर वचनों में परिहास रस वर्षण करने लगी