नव किसोर सुकुँवार तन, रँगे प्रेम के रंग।
जिनकै हिय में बसत ध्रुव, तिन सौं करि ध्रुव संग॥४०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि जिनके हृदय में नित्य निरन्तर प्रेम रङ्ग रञ्जित नवल किशोर सुकुमार वपु श्री श्यामा-श्याम निवास करते हैं, उपासक को उन्हीं का सङ्ग करना चाहिये