हार-वार मिलि कैं अरुझाने। निसि के चिन्ह निरखि मुसिकाने॥९१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
हारावली एवं केश-राशि आपस में उलझ गई थी तथा रात्रि-विलास के सरस अङ्कों को देख-देख कर युगल आनन्द मग्न हुए मन्द-मन्द मुस्कराते थे