॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 18.91

रस-मुक्तावली

हार-वार मिलि कैं अरुझाने। निसि के चिन्ह निरखि मुसिकाने॥९१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

हारावली एवं केश-राशि आपस में उलझ गई थी तथा रात्रि-विलास के सरस अङ्कों को देख-देख कर युगल आनन्द मग्न हुए मन्द-मन्द मुस्कराते थे