॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 3.46

मन-शिक्षा

कबहूँ तो थोरौ भजन, कबहूँ होत बिसाल।
मन कौ धीरज छुटै नहिं, गहै न दूजी चाल॥४६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

परिस्थितिवशात्‌ कभी भजन कम हो, कभी अधिक हो जाय तो भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिये एवं भजन की विधा में परिवर्तन करने की भी आवश्यकता नहीं है