कबहूँ तो थोरौ भजन, कबहूँ होत बिसाल।
मन कौ धीरज छुटै नहिं, गहै न दूजी चाल॥४६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
परिस्थितिवशात् कभी भजन कम हो, कभी अधिक हो जाय तो भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिये एवं भजन की विधा में परिवर्तन करने की भी आवश्यकता नहीं है