प्रथमहिं श्री गुरु-कृपा ते, यह उपजी उर आनि।
बरनौं रस-हीरावली, जुगल-केलि रसखाँनि॥१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
मङ्गलाचरण दोहा प्रस्तावना चौपाई सर्व प्रथम श्री गुरु-कृपा से मेरे हृदय में यह भावना उत्पन्न हुई है कि मैं श्रीलाड़िली-लाल युगल की 'रस हीरावली' नामक रचना के माध्यम से रसपूर्ण निकुञ्ज-केलि का वर्णन करूँ