॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 19.1

रस-हीरावली

प्रथमहिं श्री गुरु-कृपा ते, यह उपजी उर आनि।
बरनौं रस-हीरावली, जुगल-केलि रसखाँनि॥१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

मङ्गलाचरण दोहा प्रस्तावना चौपाई सर्व प्रथम श्री गुरु-कृपा से मेरे हृदय में यह भावना उत्पन्न हुई है कि मैं श्रीलाड़िली-लाल युगल की 'रस हीरावली' नामक रचना के माध्यम से रसपूर्ण निकुञ्ज-केलि का वर्णन करूँ