कैसैं कहौं छबि जो उर माँही। इन नैननिं के रसना नाहीं॥१८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया की उस छबि का कैसे वर्णन करूँ, जो मेरे हृदय में बसी है? मेरे इन नेत्रों की जिह्या तो है ही नहीं