॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 19.28

रस-हीरावली

सुठि सुढार पानिप मिति नाहीं। चंचल अंचल में न समाहीं॥२८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

दोहा चौपाई उन नेत्रों का सुढार सौन्दर्य एवं उनके लावण्य की कोई परमिति नहीं है। वह चञ्चल नयन पलकों के अञ्चल में आबद्ध नहीं किये जा सकते