सुठि सुढार पानिप मिति नाहीं। चंचल अंचल में न समाहीं॥२८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
दोहा चौपाई उन नेत्रों का सुढार सौन्दर्य एवं उनके लावण्य की कोई परमिति नहीं है। वह चञ्चल नयन पलकों के अञ्चल में आबद्ध नहीं किये जा सकते