॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 19.41

रस-हीरावली

चन्द्रहार छबि कहा कहौं, पानिप मोतिनु-हार।
मनौं रूप अरु प्रेम की, आइ मिलीं द्वै धार॥४१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

छवि-धाम किशोरी के वक्षस्थल पर विराजित चन्द्रहार एवं मुक्ता-हारों का लावण्य कहने में नहीं आता । ऐसा लगता है, मानो रूप एवं प्रेम की दो धाराएँ मिलकर आज एक हो रही हों