चन्द्रहार छबि कहा कहौं, पानिप मोतिनु-हार।
मनौं रूप अरु प्रेम की, आइ मिलीं द्वै धार॥४१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
छवि-धाम किशोरी के वक्षस्थल पर विराजित चन्द्रहार एवं मुक्ता-हारों का लावण्य कहने में नहीं आता । ऐसा लगता है, मानो रूप एवं प्रेम की दो धाराएँ मिलकर आज एक हो रही हों