॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 19.58

रस-हीरावली

अंगनि के भूषन यौं भये। मनौं मनिनु के ढँपना दये॥५८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

प्रिया अङ्ों में धारण कराये गये वे सब भूषण ऐसे लगते हैं, मानो किसी दिव्य वस्तु को मणियों के ढक्कनों से ढॉप दिया गया हो