अंगनि के भूषन यौं भये। मनौं मनिनु के ढँपना दये॥५८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
प्रिया अङ्ों में धारण कराये गये वे सब भूषण ऐसे लगते हैं, मानो किसी दिव्य वस्तु को मणियों के ढक्कनों से ढॉप दिया गया हो