॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 19.63

रस-हीरावली

चित्र भई तेहि ठाँ चतुराई। पंगु भई चितवत चपलाई॥६३॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

दोहा चौपाई स्वयं चातुरी भी जाङ्य-भाव से चित्र सी लिखी रह जाती हैं । साक्षात्‌ चञ्चलता पङ्गु होकर प्रिया के नेत्र-चाञ्चल्य को देखती रह जाती है