चित्र भई तेहि ठाँ चतुराई। पंगु भई चितवत चपलाई॥६३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
दोहा चौपाई स्वयं चातुरी भी जाङ्य-भाव से चित्र सी लिखी रह जाती हैं । साक्षात् चञ्चलता पङ्गु होकर प्रिया के नेत्र-चाञ्चल्य को देखती रह जाती है