षटरितु बरनौं जुगल हित, बहु विधि करत विहार।
रितु-रितु कौ सुख कहौं कछु, अपनी मति अनुसार॥८०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री धरुवदास जी कहते हैं कि अब मैं रसिक युगल ललित लाड़िली-लाल के षट्-ऋतु विहार में जो बहुत प्रकार का है , अपनी बुद्धि के अनुसार प्रत्येक ऋतु का सुख-विलास वर्णन करूँगा