गरजन-घन सुनि पवन-झकोरिनिं। आनँद बढ़्यौ मोर अरु मोरिनिं॥११४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
मेघों की गर्जना एवं पवन के झकोरों से मयूर एवं मयूरियों का आह्वाद बढ़ने लगा और वे थिरक-थिरक कर नाचने लगे