॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 19.114

रस-हीरावली

गरजन-घन सुनि पवन-झकोरिनिं। आनँद बढ़्यौ मोर अरु मोरिनिं॥११४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

मेघों की गर्जना एवं पवन के झकोरों से मयूर एवं मयूरियों का आह्वाद बढ़ने लगा और वे थिरक-थिरक कर नाचने लगे