तन-मन भये एक रस माँही। तेहिसुख पर सहचरि बलि जाहीं॥१४२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
तभी प्रियतम इस ऋतु के आभारी हैं । श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं हे सखि ! ऐसे रसिक प्रियतम पर मैं न्यौछावर हूँ । १४१॥जिस अनिर्वचनीय सुख में लीन होकर रसिक युगल रस-लीनता में तन-मन के एकत्व की अनुभूति में मग्न हैं, परम रसिक सखियाँ उनके उस सुख पर बारम्बार बलिहार हो रही हैं