हरि जस सुनत न पुलक तन, ढर्यौ न नैननिं नीर।
पाठ भजन सब यौं भयौ, जैसे पढ़त है कीर॥६६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री हरि का सरस यश सुनते हुए यदि शरीर पुलकित नहीं हुआ तथा नेत्र अश्रुपूरित नहीं हुए तो समस्त भजन-पाठ शुष्क तोता-रटन्त जैसा ही मानना चाहिये