॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 3.66

मन-शिक्षा

हरि जस सुनत न पुलक तन, ढर्यौ न नैननिं नीर।
पाठ भजन सब यौं भयौ, जैसे पढ़त है कीर॥६६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री हरि का सरस यश सुनते हुए यदि शरीर पुलकित नहीं हुआ तथा नेत्र अश्रुपूरित नहीं हुए तो समस्त भजन-पाठ शुष्क तोता-रटन्त जैसा ही मानना चाहिये