॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 20.19

रस-रत्नावली

ऐसौ सुख कौ रस बढ़्यौ, श्रम नहिं जान्यौ जाइ।
चाह चौंप रुचि तहाँ की, लालच चितै लजाइ॥१९॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

रसिक-युगल के सुख-विलास में रस की अभिवृद्धि के कारण शारीरिक-श्रम का काई बोध नहीं होता । लालसा , उत्कण्ठा एवं रुचि की प्रतिक्षण अभिवृद्धि का दर्शन करके मूर्तिमान्‌ लालच भी लालायित हो रहता है