ऐसौ सुख कौ रस बढ़्यौ, श्रम नहिं जान्यौ जाइ।
चाह चौंप रुचि तहाँ की, लालच चितै लजाइ॥१९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
रसिक-युगल के सुख-विलास में रस की अभिवृद्धि के कारण शारीरिक-श्रम का काई बोध नहीं होता । लालसा , उत्कण्ठा एवं रुचि की प्रतिक्षण अभिवृद्धि का दर्शन करके मूर्तिमान् लालच भी लालायित हो रहता है