॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 4.4

श्री वृन्दावन शत

यह आसा धरि चित्त में, कहत जथा-मति मोर।
वृंदावन सुख रंग कौ, काहु न पायौ ओर॥४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

अतएव मैं अपने चित्त में उनकी कृपा की आशा धारण करके, वृन्दावन का यथामति वर्णन करने का प्रयास करूँगा; क्योंकि वृन्दावन का माधुर्य विलास अनन्त है, जिसका आज तक किसी ने अन्त नहीं पाया है