॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 20.37

रस-रत्नावली

मनिगन जुत झलकत रहैं, पद अंबुज सुख-दैंन।
सहज सुभग रसनिधि सरस, प्रीतम-चित अलि ऐंन॥३७॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री श्यामा के सुखदायक चरण-कमल मणिमय नूपुरों से अलङ्कृत होकर अपनी प्रभा का प्रकाश करते रहते हैं । वे श्री चरण स्वाभाविक सुन्दर, रस के भण्डार एवं सरस हैं तथा प्रियतम के चित्त रूपी भ्रमर के लिए नित्य विश्राम स्थल हैं