मनिगन जुत झलकत रहैं, पद अंबुज सुख-दैंन।
सहज सुभग रसनिधि सरस, प्रीतम-चित अलि ऐंन॥३७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री श्यामा के सुखदायक चरण-कमल मणिमय नूपुरों से अलङ्कृत होकर अपनी प्रभा का प्रकाश करते रहते हैं । वे श्री चरण स्वाभाविक सुन्दर, रस के भण्डार एवं सरस हैं तथा प्रियतम के चित्त रूपी भ्रमर के लिए नित्य विश्राम स्थल हैं