महा गोप्य अद्भुत सरस, चिंतत रहौ मन माँहि।
या रस के रसिकनि बिना, सुनि 'ध्रुव' कहिबौ नाँहि॥५०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
पुनः वे सचेत करते हुए कहते हैं कि, “हे रसिको ! यह “रस-रतनावली' विलक्षण रूप से सरस तथा अत्यन्त गोप्य है । इसका मन-मन में चिन्तन करते रहना चाहिये । इसे रस के उपासक रसिकों के अतिरिक्त किसी अन्य से कहना अथवा इसका प्रकाश करना उचित नहीं हैं