चितवनि सौं चित रँगि रह्यौ, मुसकनि रस बस मैंन।
अँग-अँग दीप अनंग मनौं, परत पतंग जु नैंन॥२०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री प्रिया जू की चितवन-छवि में श्रीलाल का चित्त रँग गया है। उनका मदन रूपी मन, प्रिया की मन्द-मधुर स्मित के वशीभूत हो गया है। श्री प्रिया का प्रत्येक अङ्ग अनङ्ग-दीप के सदृश है, जिस पर प्रियतम के शलभ रूपी नेत्र नित्य उत्सर्ग होते रहते हैं