॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 21.20

प्रेमावली

चितवनि सौं चित रँगि रह्यौ, मुसकनि रस बस मैंन।
अँग-अँग दीप अनंग मनौं, परत पतंग जु नैंन॥२०॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री प्रिया जू की चितवन-छवि में श्रीलाल का चित्त रँग गया है। उनका मदन रूपी मन, प्रिया की मन्द-मधुर स्मित के वशीभूत हो गया है। श्री प्रिया का प्रत्येक अङ्ग अनङ्ग-दीप के सदृश है, जिस पर प्रियतम के शलभ रूपी नेत्र नित्य उत्सर्ग होते रहते हैं