अद्भुत रूप विलास सुख, चितवत भूले अंग।
सहज सिंधु सुख में परे, नख-सिख प्रेम अभंग॥२३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
इस अद्भुत सुख-विलास का दर्शन कर के प्रियतम श्रीलाल-अपना देहानुसन्धान खो बैठे हैं एवं सुख के अगाध सिन्धु में निमग्न हो कर, आपाद मस्तक वे प्रेम-रस में पूरित हो गये हैं