॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 4.8

श्री वृन्दावन शत

हरिवंश चरन उर धरनि धरि, मन वच कै विस्वास।
कुँवरि कृपा ह्वै है तबहिं, अरु वृंदावन वास॥८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

अतएव मनसा-वाचा दृढ़ विश्वास पूर्वक अपनी हृदय भूमि में श्री हित हरिवंश के चरणों को धारण करने से किशोरी श्री राधिका की निश्‍चित ही कृपा होगी एवं श्री वृन्दावन का वास मिलेगा