एकै प्रेमी एक रस, श्री राधावल्लभ आहि।
भूलि कहै कोउ और ठाँ, झूठौ जानौं ताहि॥५०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
प्रेमधाम श्री वृन्दावन दोहा कोई एक-रस एवं सहज अनन्य-प्रेमी है, तो वह केवल श्री राधावल्लभ है । यदि कोई भ्रमवश यह कहता है कि ऐसे प्रेमी कहीं अन्यत्र भी हैं तो मैं उसे सर्वथा मिथ्यावादी मानता हूँ