॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 21.51

प्रेमावली

तीन लोक चौदह भुवन, प्रेम कहूँ ‘ध्रुव’ नाहिं।
जगमग रह्यौ जराव सो, श्री वृंदावन माहिं॥५१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री धरुवदास जी कहते हैं कि तीनों लोक एवं चौदह भुवनों में कहीं भी सहज प्रेम का दर्शन नहीं है, वह तो एक मात्र श्री वृन्दावन में मणि-काञ्चनवत्‌ जगमगा रहा है