॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

श्री हित बयालीस लीला — छंद 21.74

प्रेमावली

ठौर-ठौर पिय रचत हैं, आसन-कुसुम-रसाल।
को जानैं कहाँ बैठि हैं, अलबेली नव बाल॥७४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

यह विचार करके कि अलबेली नव नागरी न जाने किस आसन पर विराजमान्‌ होंगी, रसिक प्रियतम प्रत्येक कुञ्ज में स्थान-स्थान पर छवि-पुञ्ज कुसुमासनों की रचना करते हैं