ठौर-ठौर पिय रचत हैं, आसन-कुसुम-रसाल।
को जानैं कहाँ बैठि हैं, अलबेली नव बाल॥७४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
यह विचार करके कि अलबेली नव नागरी न जाने किस आसन पर विराजमान् होंगी, रसिक प्रियतम प्रत्येक कुञ्ज में स्थान-स्थान पर छवि-पुञ्ज कुसुमासनों की रचना करते हैं