॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 21.81

प्रेमावली

प्रेम-प्रेम मन-मन समुझि, नैंन सजल झलकाति।
मुख निसरत नहिं बैंन कछु, बिबस दोउ ह्वै जाति॥८१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

यह युगल श्रीलाड़िली-लाल अपनी पारस्परिक अगाध प्रीति को अपने-अपने मन में समझ कर सजल नेत्र हो जाते हैं, वाणी कण्ठावरुद्ध हो जाती है और प्रेम-विवश दशा को प्राप्त हो जाते हैं