प्रेम-प्रेम मन-मन समुझि, नैंन सजल झलकाति।
मुख निसरत नहिं बैंन कछु, बिबस दोउ ह्वै जाति॥८१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
यह युगल श्रीलाड़िली-लाल अपनी पारस्परिक अगाध प्रीति को अपने-अपने मन में समझ कर सजल नेत्र हो जाते हैं, वाणी कण्ठावरुद्ध हो जाती है और प्रेम-विवश दशा को प्राप्त हो जाते हैं