अद्भुत प्रेम सखीनि कौ, बिमल अखंडित धार।
रसिक कुँवर दोउ लाड़िले, करि राखे उर-हार॥९६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री श्यामाश्याम युगल के प्रति तत्सुख प्रेम में रँगी, प्रेम पगी सखियाँ युगल की सहज रूप-माघुरी का अपने नेत्र-चषकों में भर-भर कर निरन्तर पान करती रहती हैं॥।९५॥सखियों के अद्भुत प्रेम की धारा अखण्डित एवं उज्जवल है , जिन्होंने रसिक युगल श्रीलाड़िली-लाल कुँवर को अपना हृदयहार बना रखा है