॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 21.107

प्रेमावली

प्रेम मदन कौ सुख जहाँ, सहज प्रेम सिंगार।
आदि मध्य अवसान इक, इक रस विमल विहार॥१०७॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

वृन्दावन के नित्य-विहार देश में प्रेमी रूपी मदन का सुख युगल प्रेम का सहज शृङ्गार है । इसके आदि-मध्य-अवसान में विशुद्ध प्रेम ही विहार रूप है