वृंदावन-रस सबकौ सारा। नित सर्वोपरि जुगल-बिहारा॥२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
['वृन्दावन-रस' के नाम से अभिसंज्ञात रस गोस्वामी श्री हित हरिवंश जी की एक अनुपम देन है, जिसका स्वरूप व्रज के अवतारवाद एवं स्वकी-यात्त्व परकीयात्त्व, विरह मिलन आदि से अतीत है। यह नित्य विहार केलि नित्य-निभृत निकुञ्जमय वृन्दावन में प्रिया , प्रियतम , सहचरी एवं वृन्दावन इन चार रूपों में अनादि-अनन्त रूप से विद्यमान है ।] यह वृन्दावन-रस प्रेम की समस्त उपासनाओं का सार है, जो नित्य है एवं श्यामा-श्याम के विहार का सर्वोपरि स्वरूप हैं