॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 23.15

रहस्य-मञ्जरी

वृंदावन छबि कहा कहौं, कैसेहुँ कहत बनैं न।
नैंननिं के रसना नहीं, रसना के नहिं नैंन॥१५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

तात्पर्य यह है कि श्री वृन्दावन सुखों की पराकाष्ठा एवं उज्ज्वल प्रेम का निज धाम है, जहाँ शत-शत प्रेमकाम की चतुरङ्गिणी सेना नित्य सेवा-परायण रहती है ।!१४॥श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि बृन्दावन की अवर्णनीय छवि का क्या वर्णन करूँ ? क्योंकि वह किसी भी प्रकार से कहने में नहीं आती । मेरे नेत्रों ने उस छवि को देखा तो है पर नेत्रों के पास वर्णन करने के लिए जिह्ल नहीं है और जिस जिह्या के पास वर्णन करने की क्षमता है उस अभागी के पास नेत्र नहीं हैं