मैंहदी रँग अनुराग सुरंगा। कर अरु चरन रचे तेहि रंगा॥६९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
दोहा चौपाई मेंहदी का अरुणिम रङ्ग ही मानो सुरङ्गित अनुराग है, जिससे नवल किशोरी के सुकोमल श्री-कर एवं चरणों को रँगती हैं