॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 23.69

रहस्य-मञ्जरी

मैंहदी रँग अनुराग सुरंगा। कर अरु चरन रचे तेहि रंगा॥६९॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

दोहा चौपाई मेंहदी का अरुणिम रङ्ग ही मानो सुरङ्गित अनुराग है, जिससे नवल किशोरी के सुकोमल श्री-कर एवं चरणों को रँगती हैं