॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 23.73

रहस्य-मञ्जरी

मौरी रँग अनुराग की डोरी। तिय कर बाँध्यौ पिय मन गोरी॥७३॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

सखियों ने आनन्द की मौरी (भूषणविशेष) अनुराग की डोरी से पिरोकर प्रिया के कर-कमलों में आबद्ध की है, जो प्रियतम के मन को पाश-बद्ध कर लेने में परम समर्थ है