छिन-छिन औरै-और सिंगार। गुहि फूलनि पहिरावत हार॥८२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
सेवा-परायण प्रियतम प्रतिक्षण प्रिया को नित्य नव-नव शवृङ्गार-भूषणों से श्रृङ्गारित करके मृदु-मृदु पुष्पों की मालाएँ गूँथ कर उन्हें धारण कराते हैं