॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 23.82

रहस्य-मञ्जरी

छिन-छिन औरै-और सिंगार। गुहि फूलनि पहिरावत हार॥८२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

सेवा-परायण प्रियतम प्रतिक्षण प्रिया को नित्य नव-नव शवृङ्गार-भूषणों से श्रृङ्गारित करके मृदु-मृदु पुष्पों की मालाएँ गूँथ कर उन्हें धारण कराते हैं